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यौवन का मूल : संयम-सदाचार
Created by Adminashram on 2/7/2015 10:30:13 PM

 


चाय-कॉफी की जगह ऋतु के अनुकूल फलों का सेवन अच्छा स्वास्थ्य-लाभ तो देता ही है, शरीर को पुष्ट भी करता है । सात्त्विक एवं अल्प आहार भी ब्रह्मचर्य की रक्षा में सहायक है । कम खाने का मतलब यह नहीं कि तुम २०० ग्राम खाते हो तो १५० ग्राम खाओ । नहीं, यदि तुम एक किलो पचा सकते हो और विकार उत्पन्न नहीं होता तो ९९० ग्राम खाओ । किंतु  तुम पचा सकते हो २०० ग्राम तो २१० ग्राम मत खाओ । इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा में सहायता मिलती है और उससे व्यक्ति में सामथ्र्य एवं सब सद्गुण सहज विकसित होते हैं ।

जहाँ चाह वहाँ राह ।

जहाँ मन की गहरी चाह होती है, आदमी वहीं पहुँच जाता है । अच्छे कर्म, अच्छा संग करने से हमारे अंदर अच्छे विचार पैदा होते हैं, हमारे जीवन की अच्छी यात्रा होती है और बुरे कर्म, बुरा संग करने से बुरे विचार उत्पन्न होते हैं एवं जीवन अधोगति की ओर चला जाता है ।

हर महान कार्य कठिन है और हलका कार्य सरल । उत्थान कठिन है और पतन सरल । पहाड़ी पर चने में परिश्रम होता है पर उतरने में परिश्रम नहीं होता । पतन के समय जरा भी परिश्रम नहीं करना पता है लेकिन परिणाम दुःखद होता है... सर्वनाश ! उत्थान के समय आराम नहीं होता, परिश्रम लगता है किंतु  परिणाम सुखद होता है । कोई कहे कि इस जमाने में बचना मुश्किल है... कठिन है...' पर कठिन है...' ऐसा समझकर अपनी शक्ति को नष्ट करना यह कहाँ की बुद्धिमानी है ?

गयी सो गयी, राख रही को...

मन का स्वभाव है नीचे के केन्द्रों में जाना । आदमी विकारों में गिर जाता है फिर भी यदि उसमें प्रबल पुरुषार्थ हो तो वह ऊपर उठ सकता है । इस जमाने में भी ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने संयम किया है और संयम से बलवान हुए हैं ।

पुरुषार्थ से सब सम्भव है लेकिन कठिन है... कठिन है...' ऐसा करके कठिनता को मानसिक सहमति दे देते हैं तो हमारे जीवन में कोई प्रगति नहीं होती । ध्रुव ने यदि सोचा होता कि प्रभुप्राप्ति कठिन है...' तो ध्रुव को प्रभु नहीं मिलते । प्रह्लाद ने यदि ऐसा सोचा होता कि भगवद्-दर्शन कठिन है...' तो उसके लिए भगवत्प्राप्ति कठिन हो जाती ।

हम किसी कार्य को जितना कठिन है...

कठिन है...' ऐसा समझते हैं, वह कार्य कठिन-कठिन ही लगने लगता है लेकिन हम कठिन को

कठिन न समझकर पुरुषार्थ करते हैं तो सफल

भी हो सकते हैं । प्रयत्नशील आदमी हजार बार असफल होने पर भी अपना प्रयत्न चालू रखता है तो भगवान उसको अवश्य मदद करते हैं ।

हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा ।

नष्ट-भ्रष्ट-निस्तेज जीवन के कगार पर पहुँचे हुए कई युवक-युवतियों को किन्हीं पुण्यात्मा साधकों के द्वारा आश्रम की दिव्य प्रेरणा-प्रकाश', ‘पुरुषार्थ परम देव' पुस्तकें पने को मिलीं तो उनका जीवन बदल गया । युवाधन को बचाने के लिए, देश के भावी नागरिकों को तेजस्वी बनाने के लिए आश्रम से जुड़े हुए सभी पुण्यात्मा अपने-अपने इलाकों में व्यक्तिगत रूप से युवक-युवतियों को दिव्य प्रेरणा-प्रकाश' पुस्तक पाँच बार पने के लिए प्रोत्साहित करें । यह छोटा-सा दिखनेवाला काम अपने-आपमें एक बहुत बड़ा पुण्यकार्य है । एक युवक या युवती की जिंदगी चमकी तो उसका पूरा परिवार और पड़ोस भी लाभान्वित होगा ।    

विश्वमानव के कल्याण की दिव्य भावनाएँ सँजोनेवाली भारतीय संस्कृति आज भी आध्यात्मिकता में शिरोमणि है । इसे रक्षित-संवर्धित करनेवाले संत-महापुरुष आज भी भारतभूमि पर विराजमान हैं । इन्हीं संत-महापुरुषों की शरण लेकर भारतीय संस्कृति के दिव्य संस्कारों को अपना के देश-विदेश के लोग आनंद व शांति का अनुभव कर रहे हैं । लेकिन यह घोर विडम्बना है कि अपने ही देश में किशोर एवं युवा वर्ग ऐसे आत्मारामी महापुरुषों के सान्निध्य और भारतीय संस्कृति के दिव्य जीवन को छोकर पाश्चात्य कल्चर के अंधानुकरण से अशांत तथा दुराचार और एड्स का शिकार हो रहा है । भारतीय संस्कृति पर हो रहे कुठाराघात से व्यथित होकर लोकहितकारी महापुरुष पूज्य संत श्री आशारामजी बापू ने इस बुराई को मोकर समाज को सही दिशा देते हुए एक अच्छाई का सर्जन करने का संकल्प लिया है : वेलेंटाइन डे की गंदगी हमारे देश में न फैले इसलिए मैंने वेलेंटाइन डे' मनाने के बदले मातृ-पितृ पूजन दिवस' मनाने का आह्वान किया है ।'

२८ विकसित देशों में हर वर्ष १३ से १९ साल की १२ लाख ५० हजार किशोरियाँ गर्भवती हो जाती हैं । उनमें से ५ लाख गर्भपात करा लेती हैं, बाकी ७ लाख ५० हजार कुँवारी माता बनकर नर्सिंग होम, सरकार एवं माँ-बाप पर बोझा बन जाती हैं अथवा वेश्यावृत्ति धारण कर लेती हैं । वेलेंटाइन डे - आई लव यू, आई लव यू...' ने तबाही मचा रखी है । इस तबाही से बचाने के लिए पूज्य बापूजी ने १४ फरवरी को बच्चे-बच्चियाँ माँ-बाप के साथ प्रेम-दिवस मनायें' यह अभियान चालू करवा दिया है । आप सभी इस अभियान में जुड़िये और औरों को भी प्रेरित करें | 

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